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जी भर न जाए

Image Courtesy: Ralf Missal (Picasa)

ओ सुनी सुनी सी सुर न जाने कहाँ से आ रही है
सुन उसे मेरा मन ख़ुशी के मारे खिल उठा है
जी करता है सुनता ही रहूँ उस सुनी अनसुनी सुर को जब तक जी भर न जाए

मौसम ही कुछ ऐसा है मतवाला
छा गया देखो मौसम रंगीला काले बादल घनघोर हुए अपनी छावनी में मंडराते हुए
जी करता है देखता रहूँ इस प्रकृति के नए दौर जब तक जी भर न जाए

अचानक सी एक नयी भावना जो मन में ऐसे जागी
बुझने का कोई सवाल नहीं उठता कुछ ही क्षणों में ऐसी फैली
जी करता है बुलाता रहूँ में तुमको जब तक जी भर न जाए